हम उस दौर में जीते जाते हैं
जिस दौर में जीना.. मरना है।
हम उस दरिया का पानी पीते हैं
जिस दरिया में ज़हर पनपता है।
वो किताबें हमको प्यारी हैं
जिनको कोई दीमक खाता है।
उस घर के हम निवासी हैं
जो मलबे से बनता जाता है।
हम उस दौर में हँसते जाते हैं
जिस दौर में हँसना.. मरना है।
उन सड़कों पर हम गीत गाते हैं
जिनमें कोई बेबस मारा जाता है।
हमको वतन-ए-ख़ुश्बू प्यारी है
पर कोई पेड़ों को काटे जाता है।
हमको ख़ामोशी बड़ी भाती है
हमारा हुक्मरान जो रूठ जाता है।
हम उस दौर में लिखते जाते हैं
जिस दौर में लिखना.. मरना है।
हम उन आँखों में सपने रखते हैं
जिन आँखों को चुराया जाता है।
हमको वो ग़ज़लें प्यारी हैं
जिनमें इंक़लाब गाया जाता है।
हमको तब सच्चाई भाती है
जब झूठ कोई सुनाता जाता है।
हम उस दौर में जीते जाते हैं
जिस दौर में जीना.. मरना है।
#Bhagyashree
#review
7 sep 2026
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जिस दौर में जीना.. मरना है।
हम उस दरिया का पानी पीते हैं
जिस दरिया में ज़हर पनपता है।
वो किताबें हमको प्यारी हैं
जिनको कोई दीमक खाता है।
उस घर के हम निवासी हैं
जो मलबे से बनता जाता है।
हम उस दौर में हँसते जाते हैं
जिस दौर में हँसना.. मरना है।
उन सड़कों पर हम गीत गाते हैं
जिनमें कोई बेबस मारा जाता है।
हमको वतन-ए-ख़ुश्बू प्यारी है
पर कोई पेड़ों को काटे जाता है।
हमको ख़ामोशी बड़ी भाती है
हमारा हुक्मरान जो रूठ जाता है।
हम उस दौर में लिखते जाते हैं
जिस दौर में लिखना.. मरना है।
हम उन आँखों में सपने रखते हैं
जिन आँखों को चुराया जाता है।
हमको वो ग़ज़लें प्यारी हैं
जिनमें इंक़लाब गाया जाता है।
हमको तब सच्चाई भाती है
जब झूठ कोई सुनाता जाता है।
हम उस दौर में जीते जाते हैं
जिस दौर में जीना.. मरना है।
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7 sep 2026
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साथ हम …
साथ हम …
फिर भी अनजान ज़ज्बात क्यों?
साथ हम …
फिर भी ये तकरार क्यों?
साथ हम …
फिर अश्कों के मौसम में दोनों तन्हा क्यों?
साथ हम …
दो बादल, दो रास्ते, एहसास एक नहीं क्यों?
साथ हम …
एक ही सवाल, एक ही जवाब, फिर भी ये मुश्किलों की परछाई क्यों?
साथ हम …
नाज़ुक दिलों की किताब में सब पन्ने कोरे क्यों?
साथ हम …
फिर भी चुपके से दूरी बढ़ती जा रही क्यों?
साथ हम …
फिर भी मन की राहों में बार-बार मुड़ कर रुकना क्यों?
साथ हम …
फिर भी बातचीत का सिलसिला अचानक थम सा गया क्यों?
हम साथ …
फिर भी हम हमेशा खामोशी में क्यों?
हम साथ …
फिर भी हर लम्हा बेकरार,बेबस क्यों?
हम साथ …
फिर भी दो शहर भीग रहे है धूप की रोशनी में क्यों?
साथ हम …
फिर भी सुकून की पलकों में सितारों की छुपी सिसकियाँ क्यों?
साथ हम …
फिर अब तक प्रेम के पेड़ की पत्तियों में मौन हुई रुसवाई क्यों?
साथ हम…
फिर भी काग़ज़ की धडकन में तेज तूफ़ान की हलचल क्यों?
साथ हम…
चाहत की कलम से जुड़े दो किनारे दूर जा रहे क्यों?
साथ हम…
फिर भी वादों की वादियों में सुकून का रास्ता काग़ज़ का बनाया जा रहा क्यों?
हम साथ…
फिर भी ये एक कहानी बेरुखी की क्यों?
हम साथ…
फिर भी एक भंवर लफ्जों के साथ- साथ इतना गहरा बन जाता क्यों?
साथ हम…
फिर भी दो अक्स ,एक मंज़िल,बहारों की बारिश में पल-पल रुखापन क्यों?
साथ हम…
फिर भी ओस की बूँद में कोई नई बात नहीं क्यों?
हम साथ…
फिर भी अनजान ज़ज्बात क्यों?
#anil
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साथ हम …
फिर भी अनजान ज़ज्बात क्यों?
साथ हम …
फिर भी ये तकरार क्यों?
साथ हम …
फिर अश्कों के मौसम में दोनों तन्हा क्यों?
साथ हम …
दो बादल, दो रास्ते, एहसास एक नहीं क्यों?
साथ हम …
एक ही सवाल, एक ही जवाब, फिर भी ये मुश्किलों की परछाई क्यों?
साथ हम …
नाज़ुक दिलों की किताब में सब पन्ने कोरे क्यों?
साथ हम …
फिर भी चुपके से दूरी बढ़ती जा रही क्यों?
साथ हम …
फिर भी मन की राहों में बार-बार मुड़ कर रुकना क्यों?
साथ हम …
फिर भी बातचीत का सिलसिला अचानक थम सा गया क्यों?
हम साथ …
फिर भी हम हमेशा खामोशी में क्यों?
हम साथ …
फिर भी हर लम्हा बेकरार,बेबस क्यों?
हम साथ …
फिर भी दो शहर भीग रहे है धूप की रोशनी में क्यों?
साथ हम …
फिर भी सुकून की पलकों में सितारों की छुपी सिसकियाँ क्यों?
साथ हम …
फिर अब तक प्रेम के पेड़ की पत्तियों में मौन हुई रुसवाई क्यों?
साथ हम…
फिर भी काग़ज़ की धडकन में तेज तूफ़ान की हलचल क्यों?
साथ हम…
चाहत की कलम से जुड़े दो किनारे दूर जा रहे क्यों?
साथ हम…
फिर भी वादों की वादियों में सुकून का रास्ता काग़ज़ का बनाया जा रहा क्यों?
हम साथ…
फिर भी ये एक कहानी बेरुखी की क्यों?
हम साथ…
फिर भी एक भंवर लफ्जों के साथ- साथ इतना गहरा बन जाता क्यों?
साथ हम…
फिर भी दो अक्स ,एक मंज़िल,बहारों की बारिश में पल-पल रुखापन क्यों?
साथ हम…
फिर भी ओस की बूँद में कोई नई बात नहीं क्यों?
हम साथ…
फिर भी अनजान ज़ज्बात क्यों?
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मैं अपने अकेलेपन में किसी को
ढुंढ रहीं थीं...
भटक रहीं थीं...
कोई अपना हो जिस अपना कहूं ऐसा
तलाश रहीं थीं...
इन्तजार कर रही है...
थक गई मैं.. तरश गई आंखे..
पर कोई नहीं मिला मुझे मेरे जैसा...
मिला तो सिर्फ छल,कपट और फरेब
#sangeetasalvi
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ढुंढ रहीं थीं...
भटक रहीं थीं...
कोई अपना हो जिस अपना कहूं ऐसा
तलाश रहीं थीं...
इन्तजार कर रही है...
थक गई मैं.. तरश गई आंखे..
पर कोई नहीं मिला मुझे मेरे जैसा...
मिला तो सिर्फ छल,कपट और फरेब
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..
मन को मुबारक एक शाम और ढल गई!
मन को मुबारक एक शाम और ढल गई!
लहलहाती– सिममसिमाती और एक साल झल गई,
शुरू पढ़ाई और जीवन को balance की सिसकियों
से हुई थी जो!
शायद ग़म और खुशी की कोलाहल में, यह भी ढल गई।
रहमत करे तो जीवन किसपे,
सारी सिसकियाँ किसी झोले में डालकर गंगा में
बह गई।
हाँ, मन को मुबारक एक शाम और ढल गई,
नई रूप में दुनिया सिखाती है, समझाती है,
रिश्ता रखकर अपना बनाती है,
कहते हैं इसे:- बस अपनी जिंदगी किसी और के
यहाँ रह गई।
जाना जमाना को शक था किसी हसीन मंजर का,
जो थी किसी उल्फ़त में , जाने वह भी किसी
ठिठोली-सी कह गई।
मन को मुबारक एक शाम और ढल गई।
खिलता-खिलाता — सुना पड़ा है मुखा की रौनक
मानो जैसे सिमटते हुए थोड़ी मुस्कान दब कर
रह गई।
खुली छूट पाकर फिर से समझदार जीभ भी कह गई,
लो तुम्हारे तीरंदाजी की आखिरी तीर से समस्या हल हुई,
मन को मुबारक एक और शाम ढल गई।
#Suman
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मन को मुबारक एक शाम और ढल गई!
मन को मुबारक एक शाम और ढल गई!
लहलहाती– सिममसिमाती और एक साल झल गई,
शुरू पढ़ाई और जीवन को balance की सिसकियों
से हुई थी जो!
शायद ग़म और खुशी की कोलाहल में, यह भी ढल गई।
रहमत करे तो जीवन किसपे,
सारी सिसकियाँ किसी झोले में डालकर गंगा में
बह गई।
हाँ, मन को मुबारक एक शाम और ढल गई,
नई रूप में दुनिया सिखाती है, समझाती है,
रिश्ता रखकर अपना बनाती है,
कहते हैं इसे:- बस अपनी जिंदगी किसी और के
यहाँ रह गई।
जाना जमाना को शक था किसी हसीन मंजर का,
जो थी किसी उल्फ़त में , जाने वह भी किसी
ठिठोली-सी कह गई।
मन को मुबारक एक शाम और ढल गई।
खिलता-खिलाता — सुना पड़ा है मुखा की रौनक
मानो जैसे सिमटते हुए थोड़ी मुस्कान दब कर
रह गई।
खुली छूट पाकर फिर से समझदार जीभ भी कह गई,
लो तुम्हारे तीरंदाजी की आखिरी तीर से समस्या हल हुई,
मन को मुबारक एक और शाम ढल गई।
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